कुछ लम्हे ...

कुछ लम्हे, आज यूँ मुझसे मिले
ना आने की कोई दस्तक हुई
ना जाने की कोई सौग़ाद छूटी ..
बस कुछ यूँ मिले
जैसे किसी मक़सद ख़ास से गुज़रते हों ..
हौले से मेरा नाम लिया
नज़रों से मुझे छू दिया
कहते थे
यही है ...... बस यही!
लफ़्ज़ों से इन्हें मत तोलो
सवाल, ना ही जवाब मैं टटोलो
कोई दिशा नहीं इनकी
ना ही कोई मार्ग दर्शक
कोई शुरुआत नहीं इनकी
ना ही कोई अंत,
ना असीम ख़ुशी
ना मन का क़रार,
ना सर्दी की धूप
ना गरमी में बारिश की फुहार
पर यही है......  बस यही !

रूह में मेरी,तेरी रूह का एहसास
मुकम्मल!

यह लम्हे आज यूँ मुझसे मिले .....
-मनप्रीत

Please listen to me recite this poem here 

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